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Tuesday, September 4, 2012

दुश्मन

Humans can survive everything with faith, love and a True friend, however what if you receive the worst from the least expected.....Heartbroken ever.
Below is an outpour of one such moment of my lifetime....You'll feel the heat..

तम चाहे जितना हो गहरा .....रौशनी से दीप्त लेकिन
दमकती है छवि तुम्हारी, ख्यालों में मेरे आज भी .......

दुश्मन 

ये मेरा ग़म है
ये मेरे हैं घाव
तुम अपने निष्पाप हाथों से
इनको मत सहलाओ,

तुम चाहती हो, ये आज भरें
और कल फिर, तुम्हारी ही
किसी निःस्वार्थ भावना से
फिर हो उठे हरे ,

ग़लतफहमी मेरी ही थी,
खुद को फूलों के बीच पाया
तो भूल गई
इनमे होते है काँटे भी

मत छुओ मत छेड़ो इनको
ये सिर्फ घाव नहीं
हैं  वो निशानियाँ दोस्ती की
देता नही कोई दोस्त जिनको 

आंधियों से भी न जो डरी
हाँ , अडिग खड़ी रही
एक फूंक में बुझा दी तुने
वो शमा मेरे विश्वास की

तुम ले गई साथ अपने , मेरी प्रेरणा, मेरी दोस्ती
अब भी लेकिन तुमसे रिश्ता है ....दुश्मनी
 


Friday, August 24, 2012

आकांक्षा

I like the contradiction present in all verses of this poem, check if you like it too..

आकांक्षा 

पाना चाहते हो मुझे अगर 
तो पहले तुम खोना सीखो 
मुस्कुराना हो जीवन भर 
तो पल भर का रोना सीखो
                                    
                             मै तो वही हूँ, जहाँ भी देखो 
                             जहाँ भी चाहो, तुम मुझको 
                             पास जो आना हो इतना 
                             तो पहले दूर जाना सीखो 

कोई भी रिश्ता, हम दोनों के 
साथ से पहले, एहसास है 
पास ही रहना, नहीं ज़रूरी 
तेरी दूरियां भी ख़ास हैं 
                             
                              प्यार में मेरे जीना चाहो 
                              गर जीवन भर, तुम यूँ ही 
                              प्यार में मेरे इस जीवन 
                              और हर जीवन 
                              पहले मर जाना सीखो। 



Thursday, August 23, 2012

तुम बिन...

This one is short and sweet and goes out for all those who were and are always with me!!

तुम बिन ...

ज़िन्दगी है कुछ  अधूरी,
चाहतें नहीं है पूरी...
हर बात में है मजबूरी
            तुम बिन ...

ख़ामोशी देती है  साथ,
यादों की होती बरसात ...
अनजानी सी लगती हर बात
             तुम बिन ...

लगे हर चेहरा, चेहरा तुम्हारा ,
उड़ता  हर बदल, आवारा..
बहका बहका सा जहां ये सारा
              तुम बिन...

यूँ  ही हो जाती नाराज़,
एहसास मेरे बन गए राज़ ...
मन रहता हर पल उदास
             तुम बिन....


Wednesday, August 22, 2012

Sometimes its good to speak the Truth..face whatever you are hiding within.to Yourself..this poem is a mirror of the times I would like to hide from my life.......

3rd August 2012
8:20 am
शैतान 

मन का शैतान
मुझे सोने नहीं देता
मेरे चेतन पे हावी हा क्षण
नसों में दौड़ता विलक्षण
अपनी विकरालता ये
खोने नहीं  देता ...

          सावन भी दिखता पतझड़ सा
          बाग़बा भी दिखता मरुस्थल सा
          लोगो के चेहरों में
          हैवानो  का भाव
          सपनो में भी मुझे कर पराजित
          अपनी हार पे   रोने नहीं  देता....

ये अविरल बढ़ता
भीषण होती विभत्सता
मेरे मानस को नित
भस्मीभूत   करता
चला जा रहा
चलता ही जा रहा
      
          मै निर्बल सी , आहत मन
          अवलंब रहित
          देखती हू , अश्रु सहित
          खुद को उस से हारते
          अपनाती जा रही हु
          उसकी अमानुषता

मुझसे ऐसे चिपका, बनाया यही मेरे जीने का ढंग
मुझमे  मुझसा कुछ बाकी न रहा, चढ़ा है बस शैतान का रंग