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Friday, September 7, 2012

लड़ाई

Lot of unwanted arguments runs in my mind, and so this poem....as it is aptly named...This irrelevant melodrama runs all the time in everyone's mind...and there is no escape. God! I feel I need to become a sage or something to win over, Why it has to be so??

लड़ाई 

हर बार सोचती हूँ
इस बार हरा दूँगी
मेरे जिद्दी मन को
इस बार सिखा दूँगी
हर बार की ये लड़ाई
खुद से ही लड़ कर
मै खुद को जिता दूँगी

                           पर हाय रे मन
                           है तो मेरा ही अपना
                           हर बार देख लेता है
                           एक सलोना सपना

जहाँ सच होता है सब कुछ
हाथ बढ़ा के पा लेती हूँ
जहाँ भी चाहूँ जा लेती हूँ
जो भी चाहूँ ,सचमुच
असम्भव नहीं कुछ
सब अपना बना लेती हूँ

                           सपना जी के ये मन
                           नहीं चाहता नींद ये खोना
                           स्वप्नलोक में जीवित रह के
                           वास्तविकता में मृत सा होना

न मन माने , न मैं मानू
मन की करूँ ,या खुद की जानू
कैसे समझाऊँ अब इसको
सब की किस्मत ऐसी नहीं होती
मन की आँखों के सपने
ज़िन्दगी की हकीकत नहीं होती
                         
                           


Tuesday, September 4, 2012

दुश्मन

Humans can survive everything with faith, love and a True friend, however what if you receive the worst from the least expected.....Heartbroken ever.
Below is an outpour of one such moment of my lifetime....You'll feel the heat..

तम चाहे जितना हो गहरा .....रौशनी से दीप्त लेकिन
दमकती है छवि तुम्हारी, ख्यालों में मेरे आज भी .......

दुश्मन 

ये मेरा ग़म है
ये मेरे हैं घाव
तुम अपने निष्पाप हाथों से
इनको मत सहलाओ,

तुम चाहती हो, ये आज भरें
और कल फिर, तुम्हारी ही
किसी निःस्वार्थ भावना से
फिर हो उठे हरे ,

ग़लतफहमी मेरी ही थी,
खुद को फूलों के बीच पाया
तो भूल गई
इनमे होते है काँटे भी

मत छुओ मत छेड़ो इनको
ये सिर्फ घाव नहीं
हैं  वो निशानियाँ दोस्ती की
देता नही कोई दोस्त जिनको 

आंधियों से भी न जो डरी
हाँ , अडिग खड़ी रही
एक फूंक में बुझा दी तुने
वो शमा मेरे विश्वास की

तुम ले गई साथ अपने , मेरी प्रेरणा, मेरी दोस्ती
अब भी लेकिन तुमसे रिश्ता है ....दुश्मनी