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Tuesday, April 21, 2015

Twisted

Twisted

All of us have a grey side...and when we have a face of with it once in a while it is a mixed bag of feelings shaking up your entire logic and really difficult to chose as its ourselves even in the grey version.
This poem  is about the inner turmoil of a married woman when she materializes her fantasy as in #MyChoice however she regrets,blames the world and finally shattered and  loveless as even her true love is not hers anymore!

Twisted

Yes I fell 
From the highness
Sure got touched 
and pampered
Caressed whole
But only my love can touch my soul

Have yearned respite
Tis was my refuge
It felt right
All yin n yang 
Entwined by pure yore
And lust in the core

Guilt twitches
Soul cries 
Even love left
against my faith 
What hell breaks the Sun
For a night of being a desirous woman

If love sets u free
why I am bruised by chains
If to desire is human
How much human is a Woman
If love rusts with a drop of rain
No love can touch my soul again


Friday, February 28, 2014

विदाई - Dedicated to all women...


This is the outpour of that emotional moment when after marriage you recall your childhood with your siblings...

विदाई

हो गई विदाई ,
चारों ओऱ शोर है
खुशियाँ फैली सबके मुख पर
भीगी क्युँ मेरी पलकों की कोर है

सारा जग नाचे ऐसे
सावन में जैसे मोर है
रौशनी से हर कोना चमके
मन में फिर क्युँ ,तम इतना घनघोर है    

अनजाने हैं रिश्ते सारे
घेरे मुझे मुस्काते चेहरे
पैरों को फिर भी खींचे
बचपन क्युँ अपनी ओर है

दीदी नहीं बुलाती मुझको
बहना नहीं चिढ़ाती मुझको
भैया मेरे संग ही रहना
तू तो मेरी ओर है

पापा मुझको रोक लो ना
मम्मी मुझको मत छोड़ो न
पल में सौंपी परदेसी को
प्रेम कि जाने कैसी ये डोर है

अब मै  समझी , माँ
कैसे तुम मेरे पास आई
फिर भी मन मेरा है व्याकुल
तुमपे नहीं क्युँ पहले सा मेरा ज़ोर है

जीवनसाथी के साथ चली मै
तुम्हारी मर्ज़ी मान चल मैं
रीत नाम से करता ठगी ये
जीवन भी कैसा चोर है । …………










Monday, August 6, 2012

This is a very strong, heart felt and story-of-every-Indian-woman poem...have a look, do let me know if you agree...

Saturday, 4th Aug,2012
1:15 am

नारी


क्यों मानू  मैं
जो तुम चाहो
क्यों ठानू मैं
जैसे कह दो
क्यों बदल लू खुद को
तुम्हारी चाल में
क्यों मैं ढालू खुद को
तुम्हारी खाल में
                           क्योंकि मैं नारी हूँ
                           विवाहित हूँ
                           तुम्हारी नज़र में बेचारी हूँ
                           माँ की मजबूरी
                           पिता की लाचारी हूँ
सृष्टि बनी ,
हम दो स्तम्भ बने इसके ;
फिर क्यों मुझे खुद से
कमज़ोर आंकते हो .
कैसा  भी नर हो , जी सकता है
तो हे समाज वालों
कोई कमी हो नारी में
तो उसे अपेक्षित क्यों मानते हो ?
                            इस संसार के खेल भी
                            अजब निराले हैं
                            मन के विकार वाले नर इसी जग में
                            पीड़ित नारी के रखवाले हैं
तुम चाहो तो मैं जियू
तुम चाहो तो मर जाऊ
कभी सीता , कभी सावित्री
कभी गंगा बन के तुमको तर जाऊं
                           तुम नियम बनाओगे
                           सब मुझपे थोपने को
                           और जब जी मचल जाये
                           खुद के नियमो को तुम तोड़ो
जहां कहो तुम वो मेरा मंदिर हो
जहां कहो मैं सर झुकाऊं
साथी नहीं, आश्रित समझू खुद को
प्यार का मैं क़र्ज़ चुकाऊं
                            गर ऐसा तुम रहे सोचते
                            हमेशा नारी को रहे कोसते
                            तो रहे याद
                            दुर्गा मैं हूँ , शक्ति मैं हूँ
                            जीवन की उत्पत्ति मैं हूँ
आज अगर अवलंब बनी हूँ
कल खुद का जीवन भी चला लूंगी
जिन हाथो में थामाँ आँचल
उनमे ही हल भी उठा लूंगी
                           नारी के बिना हो तुम अधूरे
                           जैसे अम्बर है बिन थल
                           नारी ही है संपूर्ण सृष्टि
                           नारी के बिना नहीं आएगा कल


   
                      


This is one of my old poems, I love this one...

साथी

अनजाने मन को मेरे, ये बढ़ा दिया है किसने हाथ
हौले से कर दिया ये वादा, सुख दुःख में हम देंगे साथ

आज अचानक किसने ये , अँधेरे में ज्योति जलाई
अब तो निश्चलता में भी,  चंचलता पड़ती दिखाई

मेरे सूनेपन की अमावस्या में, किसने आ दिवाली मनाई
डाला है किसने इस मन में, जीवन का ये नया आभास

आँखों की मृदुल भाषा से, किसने बोले ये संवाद
दुखी मन तू भी चख ले, जीवन का ये मीठा स्वाद


Saturday, August 4, 2012

Wrote this poem recently, wanted to share and let the world know, everyone faces this at times....

1st Aug/6:45 pm

'रिश्ता'

बहुत कोशिशे सँवारने की
बहुत ख्वाहिशेंr निभाने की
बहुत उम्मीदें बनाने की 
सब अधूरी रह गईं....


न जाने क्यों ये व्यर्थ हुई
मेरे पशोपेषित मन में
इसे ले के
हमेशा जंग हुई


कितने आंसू मेरे
इसने पिए
कितना समय इसपे
मैंने गंवाया


ये हर पल बिगड़ता
मेरी ही ओर 
उँगलियाँ उठाता
मेरा संबल गिराता


मुझे अन्दर अन्दर खा रहा
मानसिक क्लेश है
जिसे हम संजोये हुए है
कह के 'रिश्ता' 
वह तो बस
अनचाहे से
एक बंधन का अवशेष है